कुम्हार और मटके की कहानी | Story of Potter and Mataka | studylogic

 कुम्हार और मटके की कहानी 

कुम्हार और मटके की कहानी



कृष्णा अपने पिता के साथ मिट्टी के बर्तन बनाने का कार्य करता था। दोनों मिट्टी के बर्तन बनाने में खूब मेहनत करते थे। मिट्टी के बर्तनों में से सबसे अधिक पानी की मटकी बनाने का कार्य करते थे।

कृष्णा भी अपने पिता के साथ साथ बहुत मेहनत करता था। कभी वह अपने पिता के साथ खेत में जाकर मिट्टी लाने का कार्यकर्ता तो कभी पानी ला कर देता। उसके पिता चौक चलाते तो कृष्णा उस घूमते हुए चौक को देखकर काफी आश्चर्यचकित और खुश हो जाता। मटकी को अपने आकार में आती हुई देखकर वह काफी कुछ होता।

"आह! पतली छोटी गर्दन वाली मटकी और बड़ा सा गोल पेट। कितनी सुंदर है ये।

जब मटकी बन गई और पक कर तैयार हो गई तो वह मटकी को अपने पास लेकर बैठ गया, गोल गोल उसे घुमाता रहा, और अपने पिताजी से कहता "पिताजी यह मटकी तो कमाल की लगती है। "

पिताजी -:

हां कमाल की मटकी है पानी भी इतना ठंडा करती है कि इसके आगे आजकल के बड़े-बड़े फ्रीज भी फेल है। फ्रीज भी मटकी के आगे पानी भरने लगता है।

कृष्णा खिलखिला कर हंसने लगा -: "पानी भरने लगता है। 😂😂"

पिताजी -: अपनी सुराही के आगे आज कल के फ्रीज कुछ भी नहीं है।

कृष्णा -: वह कैसे ?

पिताजी -: "अरे ! इस मटकी के पानी से प्यास बुझती हैं और स्वाद भी गजब का, मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू के साथ, फ्रीज का पानी हमारा स्वास्थ्य खराब कर सकता है लेकिन मटकी का पानी से हमारा स्वास्थ्य सही रहता है।

कृष्णा -: "तब तो पिताजी मै आज इस मटकी में पानी भर कर देखता हूं।"

पिताजी -: " हा जरूर "

कृष्णा ने मटकी को अच्छी तरह से तीन से चार बार धोया और पानी भरकर आंगन में रख दिया फिर नीम के पेड़ के नीचे ठंडी हवाओं में सो गया। जब वह नींद से उठा तो वह सबसे पहले मटकी को बड़े प्यार से देखा, कृष्णा ने मटकी का ढक्कन हटाया और गिलास में पानी उड़ेल कर पीने लगा
वाह ! पिताजी पानी तो सच मुच मे बहुत ठंडा है और इसका स्वाद भी गजब का मीठा है। मज़ा आ गया , पिताजी अब हमारी मटकियां बाजार मे खूब बिकेगी ।

पिताजी निराश होकर बोले -: यही तो रोना है बेटा, आज कल सब लोग फ्रीज खरीदते है, अपने मटके अब बहुत कम बिकते है।

कृष्णा ने अपने पिताजी का उदास चेहरा देखा और, वो भी उदास हो गया , ओर मन ही मन बोला , पिताजी कहते तो ठीक है।

कृष्णा रात मे सोया तो मटकी मे पानी भरकर अपने साथ मे रखकर ही सोया। वो रात में गहरी नींद में कुछ बाते कर रहा था ।

कुम्हार और मटके की कहानी





मटकी बोल रही थी - " कृष्णा तुम कुम्हार के बेटे हो ओर मै मिट्टी की मटकी । हमारा तुम्हारा रिश्ता तो बहुत पुराना है , तुम जैसे कुम्हार मिट्टी से आकर देकर मुझे बनाते हो , वरना मै तो कुछ भी ना थी, कुम्हार से मिट्टी को कोई अलग नहीं कर सकता है।

कृष्णा बोला -: " हा पिताजी भी यही कहते है और कोई धंधा करने कि सोचे भी तो लगता है की ये मिट्टी मेरा हाथ पकड़ रही है । परन्तु अब मिट्टी के खिलौने , दिये, मटके इतने कम बिकते है की गुजारा करना मुश्किल है। इस पर भी बर्तन बेचने के बैठेने के लिए बैठने का शुल्क देना पड़ता है, क्या किया जाए।

" हा ये तो बात सही है" मटकी बोली -: कृष्णा तू एक काम कर , अपने पिताजी से कहना कि बहुत सारी मटकियां बनाएं । अब जेठ वैशाख के महीने में खूब गर्मी पड़ने वाली है , तुम हमारे शहर मे कलेक्टर साहब के ऑफिस के सामने वाली रोड पर मटकियां सजाकर बैठना । "

कृष्णा ने कहा -: आइडिया तो बहुत अच्छा है , सुना है कि कलेक्टर बहुत दयालु है । मटके के बाहर बारीक छिद्रों से पानी की नमी बाहर जाने से कृष्णा ऐसा अनुभव कर रहा था कि वह मटकी भी कृष्णा की बातो से दुखी होकर कह रही थी कि , "कृष्णा दुखी मत हो, जल्दी से काम शुरू करो पानी पी लो।

कृष्णा ने बड़े प्यार से कहा , "पीता हूं मेरी मां ! जरा सब्र करो ,"

मटकी खिलखिलाकर हसने लगी, -: हा! हा! तेरी मां ही हु ,तभी तो तेरी इतनी चिंता कर रही हूं। , शीतल , निर्मल , जल देने वाली मटकी मां।

कृष्णा की अचानक नींद खुल गई, सूरज सिर पर चढ रहा था। कृष्णा ने जल्दी ही प्यारी मटकी से पानी पिया और उसे प्यार से थपथपा कर ढक्कन बंद कर पिताजी के पास दौड़कर पहुंच गया।

" अरे मिट्टी के इतने सारे बर्तन और ढेर सारी मटकियां बन गई ।"

पिताजी -: " हा रे ! आज रात भर सोया कहा हु, तेरी मटकियों ने मुझे सोने ही कहा दिया ।"

कृष्णा :- हां पिताजी मटकी ने मुझे भी नहीं सोने दिया पिताजी मै मटकीयों को सुनहरे रंग में सजा देता हूं ताकि यह और भी सुंदर दिखने लगे। पता है पिताजी आज रात सपने में मटकियां कह रही थी कि मैं तेरी मां हूं तभी तो तेरी इतनी चिंता करती हूं।

पिताजी -: "अच्छा ! तभी मटकी ने मुझे भी सोने नहीं दिया और बनाओ और बनाओ की धुन लगाइ रही । "

कृष्णा के हाथो मे जैसे की मशीन फिट हो गई थी । वह जल्दी - जल्दी मटकी ऊपर सुनहरा रंग चढ़ा रहा था और पूरी 30 मटकिया तैयार हो गई।

कृष्णा बोला -: पिताजी आज बाजार मै मटकिया लेकर जाऊंगा।"

पिताजी बोले -: " जल्दी तेरी मर्जी ।"

एक रिक्शे में सारी मटकिया रखकर वह सीधे कलेक्टर के बंगले से गुजरने वाली रोड पर गया और थोड़ी दूर पर अपनी दुकान सजाकर बैठ गया । सूरज की किरणें धीरे-धीरे गर्म होने लगी अभी सुबह के 10:30 बजे थे। कृष्णा ने मटकी को धोकर अच्छे से पानी भर लिया था। ठंडी हवा में पानी ठंडा हो रहा था। कृष्णा ने अपनी प्यारी मटकी की ओर प्यार भरी दृष्टि से देखा, " वह मटकी को बार-बार छू कर देख रहा था, मटकी ऐसे हिल रही थी जैसे कि उसे गुदगुदी हो रही हो। तभी, उसे बंगले से एक कार आती दिखाई दी। चमचमाती लाल लाल कार। सूरज की किरणें उस पर पड़ी तो कृष्णा की आंखें चौंधिया गई। वह कार कलेक्टर की थी , लेकिन ये बात कृष्णा को मालूम नहीं था। कृष्णा ने आवाज लगाई -:

कार वाले बाबू ले को मटकी
यह मटकी है शाही
इसको खरीदेगा जो रही
उसका जीवन होगा शाही।


कार का दरवाजा खुला , सूट - बुट और टाई चश्मे मे कलेक्टर साहब उतरे । कृष्णा थोड़ी देर तक मटकी बेचना भूल गया और उनका चेहरा देखता रहा ।

कलेक्टर साहब ने कहा , "अरे कहा खो गए बाबू - राही को मटकी तो दे दो। "

" जी - जी , साहब मटकी ले लो जी मटकी । "

कलेक्टर बोले - अच्छा कितने की है मटकी ?

कृष्णा -: जी आप ही कीमत लगा लो मेरी इन प्यारी प्यारी मटकियों का , यह तो अनमोल है।

कलेक्टर -: " अच्छा फिर क्या किया जाए ? चलो मेरे साथ चलोगे , तो मै कुछ काम दिला लूंगा ओर तुम्हारी पढ़ाई का इंतजाम कर दूंगा । "

कृष्णा -: "ना बाबा ना मै कही नहीं चलूंगा । स्कूल जाता हूं मैं । आजकल छुट्टियां हैं वैसे मेरे पिताजी घर पर हैं हम तो कुम्हार हैं , हमारा रिश्ता तो सिर्फ मिट्टी से हैं हम तो कलाकार हैं मिट्टी को आकार देते हैं हम अपनी कला थोड़ी छोड़ेंगे।"

कलेक्टर साहब कृष्णा की बातों से बहुत प्रभावित हुए अच्छा तो फिर ठीक है तुम अपनी सारी मटकिया मेरी कार में रख दो यह सारी मटकिया ही मेरे ऑफिस में सबको ठंडा पानी पिला आएगी कृष्णा की खुशी का ठिकाना ना रहा कलेक्टर साहब ने कृष्णा को 3000 ₹ दिए ।

उसने मटकियों को कार में संभाल कर रखा, वो अपनी मटकियों को कार में जाते हुए देख रहा था एक क्षण के लिए वह उदास हो गया तो पानी भरी मटकी ने उसे समझाया "कितना भाग्यशाली है तू सारी मटकिया बिक गई अब अपनी मटकी का पानी कलेक्टर साहब के ऑफिस में सब पिएंगे फ्रिज का पानी छोड़ कर उनके बंगले में भी अपनी मटकिया पानी पिला आएगी। "

कृष्णा पानी भरी मटकी को गोद में लिए घर आ रहा था अपने बाबा और अपनी मिट्टी के पास। उसे लग रहा था कि मटकी नहीं आज उसकी मां ही उसे समझा रही है।





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